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राष्ट्रीय युवा दिवस: प्रतीकात्मक आयोजन या वास्तविक परिवर्तन की राह?

By damuwadhungalive

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हर वर्ष 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। मंच सजते हैं, भाषण होते हैं, संकल्प दोहराए जाते हैं। पर एक बुनियादी प्रश्न बार-बार सामने आता है—क्या केवल दिवस मनाने से युवाओं की समस्याएँ हल हो जाएँगी? या यह आयोजन भी औपचारिकताओं की भीड़ में खो जाता है?

भारत आज विश्व का सबसे युवा देश है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार भारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम और करीब 27–28 प्रतिशत 15–29 आयु वर्ग में है। यह “डेमोग्राफिक डिविडेंड” तभी वरदान बनेगा, जब यह ऊर्जा राष्ट्र निर्माण की दिशा में लगे। अन्यथा यही ऊर्जा सामाजिक विघटन का कारण भी बन सकती है।

युवाओं की ऊर्जा: अवसर या चुनौती?

युवाओं के भीतर डायनामिक एनर्जी है—नवाचार, जोखिम उठाने की क्षमता, बदलाव की ललक। स्टार्ट-अप, खेल, विज्ञान, तकनीक और सामाजिक आंदोलनों में इसका सकारात्मक उदाहरण दिखता है। भारत में आज 1 लाख से अधिक स्टार्ट-अप और लाखों युवाओं का डिजिटल कौशल से जुड़ाव आशा जगाता है।

लेकिन दूसरी ओर तस्वीर चिंताजनक भी है। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के अनुसार युवाओं में बेरोज़गारी दर सामान्य आबादी की तुलना में अधिक रही है। शिक्षित युवा भी रोजगार के लिए भटक रहा है। यह हताशा जब अवसरों से नहीं जुड़ती, तो गलत दिशाओं में मोड़ लेती है।

नशा, अपराध और हिंसक भीड़: कड़वी सच्चाई

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े बताते हैं कि अपराधों में संलिप्तता के मामलों में 18–30 आयु वर्ग की भागीदारी उल्लेखनीय है। कई राज्यों में नशे और ड्रग्स की चपेट में आने वाले युवाओं की संख्या बढ़ी है। सामाजिक मीडिया के दौर में अफवाहें और उकसावे कुछ ही घंटों में युवाओं को हिंसक भीड़ में बदल देते हैं—जहाँ सोचने की जगह उत्तेजना ले लेती है।

यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जब शिक्षा गुणवत्ता-युक्त नहीं, रोजगार सम्मानजनक नहीं और भागीदारी के मंच सीमित हों, तो युवा भटकता है।

दिवस से आगे की जरूरत

राष्ट्रीय युवा दिवस का अर्थ केवल पोस्टर, भाषण और हैशटैग नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का दिन बने—नीति-निर्माताओं, समाज और स्वयं युवाओं के लिए।

क्या किया जाए?

  1. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल: डिग्री नहीं, एम्प्लॉयबिलिटी पर फोकस।
  2. स्थानीय रोजगार और उद्यमिता: पहाड़ से मैदान तक, स्थानीय संसाधनों पर आधारित अवसर।
  3. नशामुक्ति और मानसिक स्वास्थ्य: स्कूल-कॉलेज स्तर पर काउंसलिंग और खेल-संस्कृति।
  4. लोकतांत्रिक भागीदारी: युवाओं को निर्णय-प्रक्रिया में वास्तविक स्थान।
  5. सकारात्मक नेतृत्व: विवेकानंद के विचार—चरित्र, साहस और सेवा—को व्यवहार में उतारना।

निष्कर्ष

भारत का भविष्य युवाओं के कंधों पर है, पर युवाओं का भविष्य राष्ट्र की नीतियों, समाज के मार्गदर्शन और अवसरों की ईमानदार उपलब्धता पर निर्भर है। केवल दिवस मनाने से समस्याएँ हल नहीं होंगी; जब तक हम युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा नहीं देंगे, तब तक यह शक्ति निर्माण से अधिक विघटन में खर्च होती रहेगी।

राष्ट्रीय युवा दिवस तभी सार्थक होगा, जब हर युवा यह पूछे—मैं राष्ट्र के लिए क्या कर रहा हूँ? और राष्ट्र यह सुनिश्चित करे—युवा के लिए हम क्या कर रहे हैं?

— आईपी ह्यूमन

स्वतंत्र स्तम्भकार, उत्तराखंड

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