“मोदी सरकार ने 2025 में जातिगत जनगणना कराने का निर्णय लिया है। जानिए इस फैसले के पीछे की वजहें, विपक्ष की प्रतिक्रियाएं और इसके सामाजिक-राजनीतिक असर।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्र सरकार ने 30 अप्रैल 2025 को ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए आगामी जनगणना में जातिगत आंकड़ों को शामिल करने की घोषणा की है। इस निर्णय के साथ ही देश में 1931 के बाद पहली बार सभी जातियों की विस्तृत गणना की जाएगी, जिससे सामाजिक और राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
📌 निर्णय का औपचारिक ऐलान
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट बैठक के बाद प्रेस वार्ता में बताया कि सरकार आगामी जनगणना में जातिगत विवरण भी एकत्र करेगी। उन्होंने कहा कि यह निर्णय समाज और देश के मूल्यों और हितों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
🕰️ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में अंतिम पूर्ण जातिगत जनगणना 1931 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। स्वतंत्रता के बाद से अब तक की जनगणनाओं में केवल अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के आंकड़े एकत्र किए जाते रहे हैं, जबकि अन्य जातियों की गणना नहीं की गई। 2011 में सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना (SECC) कराई गई थी, लेकिन उसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए।
🗳️ राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
विपक्षी दलों ने लंबे समय से जातिगत जनगणना की मांग की थी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए सरकार से जनगणना की समयसीमा स्पष्ट करने की मांग की है। वहीं, भाजपा ने इस कदम को विपक्ष के एजेंडे को निष्प्रभावी करने वाला बताया है।
📊 संभावित प्रभाव
आरक्षण नीति में बदलाव: वर्तमान में OBC को 27% आरक्षण प्राप्त है, लेकिन जातिगत जनगणना के आंकड़ों के आधार पर आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग उठ सकती है।
नीतिगत सुधार: जातिगत आंकड़ों के आधार पर सरकार कल्याणकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से लक्षित कर सकेगी।
राजनीतिक समीकरण: बिहार जैसे राज्यों में आगामी चुनावों के मद्देनजर यह निर्णय राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आगे की प्रक्रिया
जनगणना की प्रक्रिया में हाउस लिस्टिंग और जनसंख्या गणना शामिल होती है, जिसमें नागरिकों से उनके सामाजिक, आर्थिक और जातिगत विवरण एकत्र किए जाएंगे। यह प्रक्रिया लगभग एक वर्ष तक चल सकती है, और अंतिम आंकड़े 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक उपलब्ध हो सकते हैं।
🔍 निष्कर्ष
मोदी सरकार का यह निर्णय सामाजिक न्याय और समावेशिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, इसके राजनीतिक निहितार्थ और आरक्षण नीति पर संभावित प्रभावों को लेकर बहस जारी है। आगामी समय में यह देखा जाएगा कि यह निर्णय भारतीय समाज और राजनीति को किस दिशा में प्रभावित करता है।
स्रोत:
नवभारत टाइम्स
भास्कर एक्सप्लेनर
जनसत्ता
ABP NewS
आजतक






