ताज़ा खबरें:
हिंदुत्व के दौर में रविदास के सवाल: क्या आज बोलना संभव है?12 किमी पार करने में लगे चार घंटे, वीकेंड पर भीमताल क्षेत्र जाममौसम अलर्ट के चलते अल्मोड़ा जिले में 28 जनवरी को सभी स्कूल व आंगनबाड़ी बंदपिथौरागढ़ में 28 जनवरी को सभी स्कूलों में अवकाश घोषितडॉ अंबेडकर आदर्श विद्यालय दमुवाँ ढूँगा में 77वां गणतंत्र दिवस धूमधाम से मनाया गया

हिंदुत्व के दौर में रविदास के सवाल: क्या आज बोलना संभव है?

By damuwadhungalive

Published on:

भारत के सामाजिक–धार्मिक इतिहास में संत रविदास केवल एक भक्त संत नहीं, बल्कि वर्चस्ववादी धार्मिक संरचना के आलोचक थे। उन्होंने 15वीं–16वीं सदी में उस दौर के धर्म से सवाल किए, जब जाति व्यवस्था, कर्मकांड और ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता को ईश्वरीय व्यवस्था घोषित किया जा चुका था। आज, जब भारत में हिंदुत्व एक प्रभावशाली राजनीतिक–सांस्कृतिक विचारधारा के रूप में स्थापित हो चुका है, यह प्रश्न स्वाभाविक है—

क्या संत रविदास आज वही बोल और लिख पाते, जो उन्होंने अपने समय में कहा था?

रविदास का विरोध ईश्वर या आस्था से नहीं था। उनका विरोध उस धार्मिक सत्ता से था, जो ईश्वर के नाम पर मनुष्य को ऊँच–नीच में बाँटती थी। उन्होंने मूर्ति पूजा, तीर्थ, कर्मकांड और बाह्य आडंबर पर सवाल उठाए और श्रम, समानता व मनुष्यता को धर्म का केंद्र बताया।

उनकी प्रसिद्ध पंक्ति—

“पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़”

दरअसल एक तर्क है, व्यंग्य नहीं। यह पंक्ति आस्था के नाम पर विवेक को स्थगित करने की प्रवृत्ति पर सीधा प्रहार करती है। आज के संदर्भ में यही पंक्ति “धार्मिक भावनाएँ आहत करने” के आरोप में विवाद और कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकती है।

आज का हिंदुत्व केवल धार्मिक पहचान नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक अनुशासन है। यह अनुशासन सवालों को स्वीकार नहीं करता। यहाँ असहमति को राष्ट्रविरोध, आलोचना को धर्मविरोध और तर्क को साज़िश बताकर खारिज कर दिया जाता है। ऐसे वातावरण में रविदास जैसे संत, जो धर्म के भीतर रहकर धर्म की सत्ता से सवाल करते थे, सहज ही असुविधाजनक ठहराए जाते।

विडंबना यह है कि आज रविदास को “हिंदू संत” के रूप में बड़े उत्सवों के साथ प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन उनके विचारों को या तो चुनिंदा रूप में दिखाया जाता है या पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया जाता है। उनकी जाति-विरोधी चेतना, ब्राह्मणवादी वर्चस्व पर प्रहार और मूर्ति पूजा की आलोचना को मुख्यधारा से बाहर रखा जाता है। यह प्रक्रिया सम्मान की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अपहरण की है।

रविदास की भक्ति समर्पण की नहीं, मुक्ति की भक्ति थी। वे ऐसा धर्म चाहते थे जो भय नहीं, बराबरी पैदा करे। इसके विपरीत, समकालीन हिंदुत्व एक ऐसी धार्मिक चेतना को बढ़ावा देता है, जहाँ पहचान सर्वोपरि है और मनुष्यता गौण। जाति को नकारने के बजाय उसे “सांस्कृतिक विविधता” के नाम पर सुरक्षित किया जाता है।

यह संयोग नहीं है कि रविदास की सोच डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों से वैचारिक रूप से मेल खाती है। दोनों के लिए धर्म का मूल्यांकन उसके सामाजिक परिणामों से होता है, न कि उसकी परंपराओं से। अंबेडकर ने चेताया था कि जब धर्म सत्ता से जुड़ जाता है, तो वह न्याय का नहीं, वर्चस्व का औज़ार बन जाता है।

यदि आज रविदास वही कहते—कि ईश्वर मंदिर में नहीं, मनुष्य में है; कि जाति पाप है; कि पाखंड धर्म नहीं—तो संभव है कि उन्हें मंच न मिलता, उनके शब्दों को “गलत संदर्भ” कहकर खारिज किया जाता या उन्हें वैचारिक रूप से अपराधी ठहराया जाता।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि रविदास आज बोल पाते या नहीं।

असली सवाल यह है कि क्या आज का समाज, सत्ता और धार्मिक चेतना ऐसे सवालों को सुनने के लिए तैयार है?

रविदास को पूजना आसान है,

लेकिन रविदास को समझना आज भी उतना ही चुनौतीपूर्ण—और उतना ही खतरनाक—है।

Leave a Comment