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‘हिमालय दलित है’ पर हुआ शोध: डॉ. मोहन मुक्त की पुस्तक पर छात्राओं का शैक्षणिक विमर्श

By damuwadhungalive

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हरिद्वार/पिथौरागढ़।
राजकीय महाविद्यालय मंगलौर, हरिद्वार (श्री देव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय, बादशाहीथौल, टिहरी गढ़वाल) की बी.ए. छठे सेमेस्टर की चार छात्राओं — साक्षी, कोमल, निशा और नैना — ने ‘हिमालय दलित है’ पुस्तक पर आधारित एक लघु शोध प्रबंध तैयार किया है। यह शोध कार्य असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राम भरोसे के निर्देशन में सम्पन्न हुआ है।

इस अकादमिक उपलब्धि पर ‘हिमालय दलित है’ पुस्तक के लेखक डॉ. मोहन मुक्त ने प्रसन्नता और गर्व जाहिर किया है। उन्होंने छात्राओं और उनके गाइड को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह देखकर खुशी होती है कि उनके लेखन पर अब शैक्षणिक शोध कार्य शुरू हो चुका है। उन्होंने कहा, “किताबें और कविता अपना काम कर रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि बेटियाँ, छात्राएँ और महिलाएँ इस विमर्श को आगे ले जा रही हैं।”

डॉ. मोहन मुक्त, जो पिथौरागढ़ जनपद के रहने वाले हैं, वर्तमान में उत्तराखंड के प्रमुख दलित चिंतक, क्रांतिकारी कवि और लेखक माने जाते हैं। उनकी कई पुस्तकें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। वे डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों से गहराई से प्रभावित हैं और उनके अनुयायी हैं।

सिर्फ लेखन तक सीमित न रहते हुए, डॉ. मोहन ने समाज में वैचारिक जागरूकता फैलाने के लिए पिथौरागढ़ और गंगोलीहाट में डॉ. अंबेडकर पुस्तकालय की स्थापना भी की है। यह पुस्तकालय दलित विचारधारा, सामाजिक न्याय और बहुजन चेतना के प्रचार-प्रसार में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

यह शोध कार्य ‘हिमालय दलित है’ पर तीसरा अकादमिक प्रयास है। इससे पहले किरण कुंज लोहिया का लघु शोध प्रबंध और डॉ. मनीषा आर्य का रिसर्च आर्टिकल सामने आ चुके हैं। यह सिलसिला इस बात का संकेत है कि अब साहित्य केवल पढ़ा नहीं जा रहा, उस पर गंभीर विमर्श और शोध भी आरंभ हो चुका है।

डॉ. मोहन मुक्त की पुस्तक ‘हिमालय दलित है’ का समर्पण भी इस विचार को आगे बढ़ाता है:
स्त्रियों ने ही मुझे कवि बनाया है… मैं उनका कर्ज़दार हूँ।”

यह शोध प्रबंध छात्राओं द्वारा बहुजन विमर्श को नई दिशा देने और साहित्य को जनचेतना से जोड़ने की एक सराहनीय पहल है।

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